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Friday, 10 August 2012

POPULAR CULTURE : वैश्विक बाज़ार के 365 दिन

      
                                 पॉपुलर कल्चर , पॉप   कल्चर या फिर लोकप्रिय कल्चर आज न सिर्फ शहर  जीवन बल्कि आंचलिक जीवन का भी हिस्सा बन चुका  है ! मॉल, मल्टीप्लेक्स से होकर आज पॉपुलर कल्चर प्रत्येक वर्ग की जीवन शैली में सेंध लगा चुका है ! यानि की ज़ाहिरी तौर पर आज लोकप्रिय कल्चर आम जन जीवन का हिस्सा  बन चुका है !यहाँ लोकप्रिय संकृति  को समझना तब ज़रूरी हो जाता है जब लोकप्रिय  संस्कृति  'लोक संस्कृति'  और 'जन-संस्कृति ' के अंतर में भ्रम उत्त्पन्न होने लगता है ..!
           यदि हम लोक संस्कृति को मोटे तौर पर जानें तो निश्चय ही लोकप्रिय संस्कृति में जन जीवन के सुख -दुःख और अंतर्विरोध सामूहिक लेकिन स्वतः स्फूर्त रूपों में होते हैं वहीँ 'जन-संस्कृति' के निर्माता इसका इस्तेमाल बतौर कच्चे माल के रूप में करते हैं, क्योंकि इसमें जनता की आकाक्षाएं  भ्रूण रूप में मौजूद होती हैं , अतः कहा जा सकता  है की आकाक्षाएं  शासक  वर्गीय  विचारधारा , जनता के पिछड़े चिंतन और परम्पराओं  से प्रभावित रहती हैं ! वहीँ 'लोक-संस्कृति ' मनुष्य की सामूहिक चेतना की सहज  अभिव्यक्ति होती है ! वह मनुष्य के सामाजिक अनुभवों का सर्जनात्मक रूपांतर है . लोक मंगल की कामना उसका सारतत्व है . उसकी वास्तु में जीवन के नैसर्गिक लयहोती है  ,वह स्तानीय हो सकती है और उसमे मनोरंजन के भरपूर तत्व भी हो सकते हैं लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए की उसका एक सामाजिक चरित्र  होता है . वह व्यक्ति को समूह के भीतर  है  और उसका सर्वांगिये  परोपकार करती है सामूहिकता उसकी सर्वप्रमुख विशेषता है और जहाँ तक कहा जाये " सामाजिक सहकर " उसका अर्थपूर्ण सन्देश है !!
  
      वहीँ 'लोकप्रिय  संस्कृति(पोपुलर कल्चर ) ' की रचनाएँ लोक संस्कृति  की तरह सामूहिक उत्पाद नहीं होती हैं .उनका उत्पादन जनता के चिंतन के स्तर  को बिठाये बिना  उन्हें बड़े पैमाने पर आकर्षित करने के लिए किया जाता है एक नज़रिए से देखा जाये तो उनमे  न सिर्फ तत्कालीन प्रभावी चिंतन पद्दति के मज़बूत प्रभाव होते हैं बल्कि वे इसे बल भी प्रदान करते हैं.
     आज हम लोकप्रिय संस्कृति  को यदि बाज़ार की अभिव्यक्ति  कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी ! क्योंकि आज ये जो संस्कृति जिस रूप में सामान्य जन के सामने आई है वह  बाज़ार का मात्र प्रतिनिधित्व   करती है ! यदि बाज़ार की बात करें तो आज के बाज़ार की रन नीति पूर्ण रूप से जी.पी.एल( ग्लोबलाईजेशन, प्राईवेटाईजेशान और लिबरलायीजेशन)  की विचारधाराओं पर चलती है. आज के बाज़ार और पहले के बाज़ार में ज़मीन-असमान का अंतर है ( हालाँकि बाज़ार का मूल कार्य उपभोक्ताओं तक सुविधाओं को पहुँचाना है ) पहले का बाज़ार एक स्वाभाविक  और नैसर्गिक बाज़ार  था . आज के बाज़ार को हम इस अर्थ में अस्वाभाविक और अप्राकृतिक कह सकते हैं . क्योंकि आज ये बाज़ार सिर्फ उपभोग की आवश्यकताओं का आरोपण करता है .  उसके द्वारा पोषित -पालित  "उपभोक्ता-संस्कृति ' लुभावने विज्ञापनों के माध्यमों से पूरे  समाज में अपना प्रभुत्व स्थापित करती है . इस बाज़ार की नि : संकोच अपनी  एक विचारधारा  है , एक जीवन शैली है , और एक शिल्प  है . इस बाज़ार की अपनी एक संस्कृति भी है जिसके मुख्याधायरा के सभी लोग नुमाइंदे हैं . ये बाज़ार  वास्तविक 'लोक-संस्कृति' के सामानांतर  लोकप्रियता के नाम पर लोगों पर थोपी जाती है , जो की बाज़ार के हितों के अनुकूल होती हैं  . 'लोक प्रिय संस्कृति ' को प्रोद्योगिकी के माध्यम से लोकप्रिय बनाया जाता है . आज बाज़ार में दिन प्रतिदिन नयी-नयी तकनीक विकास से लैस यन्त्र और उपकरण लौंच हो रहे हैं . जिन्हें  यदि देखा जाये तो मुख्य  रूप से युवाओं को टार्गेट कर  बाज़ार उतरा जाता है . " उत्पादों को तैयार करने में लोकल टच और फील की  रणनीति को अपनाया  जाता है .

        लोकप्रिय संस्कृति ज़ाहिरी तौर पर बाज़ार की पैदाइश है . यदि देखा जाये तो आमतौर पर हमारे साल- भर में कुछेक पर्व आते हैं , और उन्हें मानाने के अवसर मिलते है . किन्तु इस संस्कृति में  साल भर के ३६५ दिन वैश्विक बाज़ार के पर्व मानाने के अवसर मिल जाते हैं .
    ये संस्कृति तीन 'म ' कारों के सहारे पैदा होती है - १) मनी, २) मार्केट, ३)मीडिया , यही कारण है की इन तीन 'म ' कारों के विकास और व्याप्ति के साथ -साथ लोकप्रिय संस्कृति भी बढती जा रही है . और इसका दायरा भी विकसित होता जा रहा है .

Thursday, 1 March 2012

भारत का पोर्निकरण


 बढती लोकप्रियता और  पोर्न के प्रति नशा 

इन्टरनेट के आने के बाद से अनेक बदलाव देखने को मिले हैं न सिर्फ विश्व में बल्कि विश्व के छोटे से छोटे कोने में भी आज विलक्षण बदलाव देखे जा सकते हैं ! आज के परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो ये कहना ज़रा भी अतिशयोक्तीपूर्ण  नहीं होगा की ....आज की सूचना क्रांति का महासृजक केवल और केवल इन्टरनेट ही है! आज इन्टरनेट ने सम्पूर्ण विश्व को एक पी.सी और लैपटॉप पर ला कर सीमित कर दिया है..या ये कहें की सम्पूर्ण विश्व को एक ही जगह लाकर एक कर दिया है. इसने राष्ट्रीयता की सीमाओं को ना सिर्फ खत्म किया है है बल्कि देशों को एक दूसरे  के और करीब ला दिया है. इंटरनेट सही मायनो में आधुनिकता की धुरी के साथ-साथ उत्तराधुनिकता के विमर्श का एक सही मंच बन चुका है. आज इस हाईपर - टेक्स्ट का पाठक  केवल  पाठक नहीं रहा है..बल्कि वो आज सृजक भी है..वह  अपने  काम  को जैसे चाहे अंजाम दे सकता है..जो  मन करे वो देख सकता है पढ़ सकता है सुन सकता है...आज के इस महंगाई भरे दौर में केवल इन्टरनेट वो बनकर उभरा है जिसने सभी माध्यमों की तुलना में सबसे सस्ताई दिखाई है..महज कुछ भुगतान के बाद अनेक सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं..!!

लेकिन जहाँ एक ओर  इस इंटरनेट ने इतनी सुविधाओं को दिया है वहीँ दूसरी ओर काफी विकृतियों को भी जन्म दिया है..उदाहरण स्वरुप  अश्लीलता के पैमानों को लांघ कर एक नयी दुनिया का सृजन कर डाला है...!!!जिसमे  आज का इन्टरनेट का उपभोक्ता वर्ग ही रहता है..और उन उपभोक्ता  वर्गों में भी कई वर्ग बन चुके हैं..वेसे कहा तो ये जाता है की अश्लीता का कोई पैमाना नहीं होता है वो तो केवल युग ओर क्षेत्रीय के सापेक्ष होती है ..आज इन्टरनेट पर असभ्य भाषा, गंदे सन्देश,के अबाधित  प्रसार ने मानवीय संवेदन शीलता को अमानवीय बनाने का कुचक्र बड़े पैमाने पर किया जा रहा है..  इसी का एक रूप हमें पोर्न के रूप में देखने को मिल रहा है..किसी ज़माने में इस पोर्न से सम्बंधित वस्तुएं चोरी-छिपे देखी और  बेचीं जाती थीं..जिसमे  महिलाओं के लिए तो ये सब वस्तुएं काफी दुर्लभ हुआ करती थीं..लेकिन आज इन्टरनेट के  डिजिटलाईजेशन ओर अबाधित व्यवसायीकरण ने पोर्न के व्यापर को नए आयाम दे डाले  हैं..इंटरटेनमेंट के सबसे सस्ते माध्यम ने जैसे ही बाज़ार में कदम रखा वैसे ही एक लोकप्रिय माध्यम बन गया और आज आलम ये है की विदेशों से आने वाले विडिओ  सबसे ज्यादा भारत में ही देखे जा रहे हैं.....!
          बहरहाल वर्तमान समय में अमेरिका ही ऐसा देश है जहाँ सबसे ज्यादा पोर्न फिल्म बनायीं जाती हैं...हालाँकि  सत्तर के दशक में अमेरिका में भी इस के लिए काफी पहले ही रोक  लगा दी थी ...अंततः ये देखा गया की रातों रात मार्केट से इस प्रकार की सामग्री गायब हो गयी लेकिन कुछ ही समय बाद इन्टरनेट ने स्टोरी board के रूप में वापसी की और आज इन्टरनेट ने इस विषय में काफी तराकी  हासिल कर ली है ...!!
              पोर्न सामग्री आसानी से  उपलब्ध  कराने में डिजिटल  टेक्नोलोजी   की बड़ी भूमिका रही है...आज डिजिटल  कैमरा से बड़ी ही असानी से तस्वीरें खींचीं जा सकटी   हैं, और उन्हें इन्टरनेट के माध्यम से ही बड़ी ही आसानी और शीघ्रता से कही भी भेजा जा सकता है....आज डिजिटल कैमरे से ली हुई फोटो ग्राफ्स का किसी भी प्रकार से दुरूपयोग किया जा सकत है...अनेक गैरपेशेवर फोटोग्राफर इस पद्धति का दुर-उपयोग   कर के पोर्नोग्राफी फिल्म तैयार कर के धड़ल्ले से बेच रहे हैं...और नेट पर इस प्रकार की सामग्री उपलब्ध करवा  रहे हैं...यदि देखा जाये तो "एमेच्योर डोट कॉम " इसी वजह से सबसे ज्यादा लोकप्रिय साईट है वर्तमान समय में ...!!


      ये बात तो उल्लेखनीय है ही की 'एमेच्योर ' एक विधा है,जो पहले मुद्रित माध्यमो (प्रिंट मीडिया )में पहले आई ..!!मुद्रित माध्यमो से जो लोग पोर्नोग्राफी तैयार कर रहे थे वही  लोग इस  के लिए आगे आये....ये एक प्रकार से मुद्रित माध्यमों  का डिजिटल  रूपांतरण है...क्योंकि   आज समय वर्चुअल रिअलिटी का है ...ऐसे में सभी इसी वर्चुअल के पीछे  भागने लगे हैं..यहाँ वर्चुअल से तात्पर्य है --''जो वास्तव में उपलब्ध न हो ,जिस विषय के लिए असंतोष हो.. दरअसल वर्चुअल का सम्बन्ध बहुराष्ट्रीय  कम्पनियों और पूँजी  का समीकरण है...!!आज  वर्चुअल से अलग हट कर जीना संभव नहीं है ...!!आज वर्चुअल  ने आर्थिक, राजनैतिक,सामाजिक,वैज्ञानिक न्याय,धर्म,दर्शन  और सांस्कृतिक सभी क्षेत्रों में पैर पसार लिए हैं...इस परिप्रेक्ष्य  में  देखें तो हमें पोर्न क्रांति को अनदेखा नहीं करना चाहिए..!!आज इस ने संपूर्ण विश्व के  प्रत्येक तबके में  एक नया जनाधार तैयार कर लिया है....!!!परिणामस्वरुप आज इस से बचना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन जान पड़ने लगा है..!!खासकर शिक्षित वर्ग में शायद  ही कोई व्यक्ति ऐसा हो जिसने पोर्न न देkhee  हो..यदि ना भी देखी हो तो केबल, टेलीविजन ,और विडियो क्रान्ति और फिल्मों के  उस विषय में उत्सुकता जगा दी  हैं..!! भारतीय  सिनेमा के आज के प्रत्येक गाने में अश्लीलता ओर द्विअर्थी शदों का सम्मलेन  के साथ भोंडे नाच को शामिल कर  के ना जाने सिनेमा को   कहाँ  ले जाने का बीड़ा उठा रखा है??


                यदि देखा जाये तो भारत के पोर्निकरण  में कुछ तत्वों ने बढ़ी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है उदाहरण के लिए देखें तो  पिछले दिनों  दक्षिण भारत की अभिनेत्री सिल्क स्मिता पर बनी फिल्म ने पहले ही हफ्ते ने 50  करोड़  की कअमाई कर डाली ..दूसरी और सनलस्ट  से गठजोड़  के कारण पोर्न इंडस्ट्री की नामी गिनामी हस्तियों में शामिल  इंडो-कनाडियाई पोर्न एक्ट्रेस सनी लेयोनी(करेन मल्होत्रा ) सबसे महंगी पोर्न एक्ट्रेस और मुह मांगी कीमत वसूल करने वाली एक्ट्रेस भारतीय मूल की है...!!उनका कहना है की "मेरे भारत में आने के  कारण  ही  भारतीय लोगों ने पोर्न पर खुलकर बात करनी शुरू की है...उनकी दिलचस्पी तो पहले से थी  लेकिन रहय अब जा कर खुला है."   वहीँ वर्ल्ड कप के कारण सुर्ख़ियों में आई  मॉडल पूनम पाण्डेय में ये घोषणा की थी की  अगर भारत ने कप जीता  तो वेह निर्वस्त्र होंगी ..!!यहाँ ये समझ नहीं आता की क्या भारतीय परंपरा  कुछ इस प्रकार से कहती भी है ???की जीत की ख़ुशी निर्वस्त्र   हो कर मनाएं..!!


                आज भारत में लोगों में  पोर्न के प्रति  रुझान काफी देखने को मिल रहा है..!!आज मुंबई में फिल्म पार्लरों में 10 से 20 रूपये मात्र में पोर्न फिल्मे देखी जाती हैं..!!और उनका दर्शक वर्ग मजदूर वर्ग है..जहाँ 51 इंच का एक टीवी और सीडी प्लेयर होता है..गंदगी और बदबू  से   उन दर्शकों  को कोई आपत्ति  नहीं होती है ..!!
      अहमदाबाद में मोबाइल के मालिक मोटी  कमाई  कर रहे हैं...जिनके मुख्य ग्राहक युवा वर्ग है वे लोग हार्ड डिस्क से मोबाइल के मेमोरी कार्ड में   फिल्म ट्रांसफर कर देते हैं...जहाँ 30  मिनट  की एक विडियो 100 से 200 रुपये में उपलब्ध हो जाती है ...!!
      कलकत्ता में पोर्नोग्राफी के प्रति रुझान भले ही कम देखने को मिला है लेकिन गूगल सर्च में वो इस विषय में शीर्ष शहरों में की फेहरिस्त में शामिल है..!!
       वहीँ दिल्ली में हुई सर्वे के अनुसार दिल्ली के टॉप स्कूलों में ये पाया गया की   47 फीसदी लड़कों और २९ फीसदी लड़कियों ने पोर्न फ़िल्में देखीं हैं...!!वर्तमान समय में 3 जी का उपभोक्ता वर्ग में  5 में से एक उपभोक्ता दिल्ली एक पोर्न देखता है..!! और कॉलेजों के युवाओं  में देखा जाये तो यहाँ भी 47 फीसदी युवा रोज़ इस विषय पर बात करते हैं..!! यानि की स्मार्ट  फोन के रूप में आज पोर्न जेबों में घुमने लगा है..!!ओफीसों में ये साइट्स खोले लोग अक्सर दिख जाते हैं..!!!इस बात का सबसे अच्छा उदाहरण है हाल ही में हुए कर्नाटक   के विडियो कांड में वहां   के मंत्रियों द्वारा पूनम पाण्डेय का बाथरूम क्लिप और रेव पार्टिओं के दौरान हुए बलात्कारों की विडियो देखते हुए संसाद में पकड़ा जाना ..!!


              वैश्विक वेब इन्फोर्मशन  कंपनी ALEXA  ने जिन भारतीय वेबसाइटों  को शीर्ष (टॉप)500 में जगह दी है उनमे से 25 सीटें पोर्न हैं...यानि की अंदाजा लगाया जा सकता है पोर्न के रुझानों में इस प्रकार की साइटें  किस प्रकार अपना रोल  अदा कर रहीं हैं..!!आज पोर्न इंडस्ट्री 4 अरब  डॉलर  से 15 अरब डॉलर की है..!!जिसका सबसे बड़ा सृजक अमेरिका है..!! आज अमेरिका से संचालित इन साइटों में अनेक प्रकार की साइटें है पोर्न से जुडी --समलैंगिक, सामूहिक, इत्यादी लेकिन हद तो तब है जब बच्चों को इन सीटों से जोड़ने के लिए कुछ इस प्रकार की टीन एज पोर्न साइट्स बना दी हैं..जिनमे अधिकतर  वीडियो एशिया तथा अफ्रीका के बच्चों की हैं...और कुछ यूरोप के देशों की..यदि यहाँ देखा जाये की एशिया ओर अफ्रीका के देशों की बच्चों की ऐसी विडियो क्यों हैं???तो इसके पीछे एक बहुत ही बड़ा तथ्य सामने आता है ...क्योंकि इसके पीछे सबसे बड़ा करक यहाँ की आर्थिक स्थिति है ..यहाँ के गरीब घरों के माता-पिताओं को  बाकायदा इस के लिए पैसे दिए जाते हैं ..और एक निश्चित धनराशी पर ये विडियो बनवाई जाती हैं..!!
      खुद भारत  में ही  सविता भाभी जैसे पोर्न साइट्स चलती हैं जिसमे एक गृहणी को दिखाया गया है की किस प्रकार वो खुद लोगों को अपना शिकार बनाती है अपने जिस्म से  ...!!!साथ ही आज देखा जाये तो फेसबुक जैसी सोशल नेट्वोर्किंग पर ही फेक   आई.डी  वाले  अनेक  लोग  मिल जाते हैं jo  अश्लील सामग्री को अपलोड करते हैं ..!!और दूसरी ओर अडल्ट ऑरकुट जैसी साइट्स का बन न काफी घाताक  सिद्ध होगा..हमागी आगे की पीढ़ियों के liye..!!
          आज इस विषय में भारतीय मार्गदर्शन काफी भटकाव पूर्ण हो दिखाई जान पड़ रहा है और भविष्य गर्त में जाता दिख रह है..!!पहली बात तो ये है की पोर्न सामग्री के प्रचार-प्रसार को रोकने के  लिए हमारे देश में न तो पर्याप्त कानून हैं और न पर्याप्त प्रशासनिक  मशीनरी  है ..!! भारत में ये सब इतने बड़े पैमाने पर इसी लिए देखा जा रहा है क्योंकि भारत में साक्षरता की कमी है ओर जानकारियों का अभाव है..!! ये अवैध तो हैं ही ..लेकिन इन पर रोक के कोई मापदंड तो दूर दूर तक दिखाई नहीं पड़ रहे हैं..!!क्योंकि इन्टरनेट पर इसकी रोकथाम तो नामुमकिन है..!!!ऐसे में ज़रुरत है इस विषय पर सोच विचार करने की ..और उसका सबसे बड़ा समाधान साक्षरता ओर जानकारी है..!!

Wednesday, 1 February 2012

महीना फरवरी का : वक़्त है पोपुलर प्रेम का !!!!




                       समझ नहीं आ रहा है की शुरुआत कहाँ से करूँ ? ...विषय ही इतना पोपुलर है की समझ पाना सच में मुश्किल  है की   लिखूं  क्या और क्या  नहीं ? ताकि अपने विद्वानों को रिझाने  में किसी हद तक कामयाब हो सकूँ  ....!!! बहरहाल शुरुआत करते हैं पोपुलर कल्चर से  पोपुलर  कल्चर यानि की "पोप-कल्चर" या फिर भारतीय भाषा में "लोक्रप्रिय-संस्कृति'!!!  और एक ऐसी संस्कृति जो की आज न सिर्फ भारतीय समाज में बल्कि संपूर्ण विश्व के युवाओं का टेस्ट और आदतें लगभग एक सामान कर डाली हैं...!!!तो साथ ही इस पोपुलर कल्चर  जिसकी जड़ें निकली उन अन्तराष्ट्रीय  कंपनियों से जो भारत में आई  तो सही और  आने के बाद भारतीय बाज़ार का स्वरुप ही बदल डाला..!!!जहाँ  भारतीय बाज़ार एक पारम्परिकता को दर्शाता था....आज वही बाज़ार "पोपुलर कल्चर" क़ो प्रोमोट  करने में जुटा  हुआ नज़र आता  है..!!! 
      भारत मे किस प्रकार विदेशी एवं अंतरराष्ट्रीय  कंपनियों  ने अपनी पैठ बनाई है वो सच मे काबिल-ए-तारीफ़  है .. ये  महिना फरवरी  का है ...यानि की प्रेमियों  के लिए पूरा महिना...!!!!और इसी महीने में देखने को मिलता है प्रेम का नया और लेटेस्ट रूप जिसे "पोपुलर प्रेम" के नाम से जाना जाने लगा है...!!!!

                      दरसल पोपुलर-प्रेम से तात्पर्य उस प्रेम से है जो आज पुरे विश्व में एड्स की भांति फ़ैल रहा है...!!! ये ऐसा प्रेम है जो  बस एक बार देखने में ही हो जाता है और सीसीडी में जा कर प्यार का इज़हार हो जाता है...!!!और पोपुलर कल्चर का सबसे बड़ा अस्त्र यानि की फेसबुक पर ही चेटिंग   करते ही प्रोपोज़ल    मिल जाते हैं और वही उस प्यार का इज़हार भी हो जाता है ...!!.....लेकिन उस प्रेम की कोई गैरंटी  नहीं होती की ये प्रेम सफल हो पायेगा या फिर ज्यादा दिन चल पायेगा ...!!!...दूसरे  शब्दों में कहे तो ये प्रेम मात्र चाइनीज़   माल की तरह होता है जो ना जाने कब साथ छोड़ दे...... और कब दो पहिये की गाडी एक ही पहिये की हो जाये कुछ कहा नहीं जा सकता ...!!!
                    आज ये प्रेम शहरी युवाओं के सर चढ़ कर बोलने लगा है...!!!!..फरवरी माह जिसका हर एक दिन पोपुलर प्रेम के नाम से जाना जाता है...!!!ये सिलसिला चोकोलेट  से होकर टेड्डी  और ना जाने कहाँ -कहाँ  से होकर अपने गंतव्य १४ फरवरी यानि की वेलेंटाइन-डे तक पहुँचता है...!!!....इस दिन का इंतज़ार प्रेमी-जन साल भर करते हैं......और पोपुलर प्रेमियों  के लिए   तो एक ख़ुशी  की बात  ये  भी है की इस   बार फरवरी 29 दिन की है ....यानी  की प्रेम के महीने में एक दिन का इजाफा .....! इन प्रेमियों के लिए एक दिन क्या यदि एक घंटा भी साथ बिताने को मिल जाता है तो ये खुद को भाग्यशाली समझते हैं...!!!एक तो शहरों की इतनी व्यस्तता के के कारण ये लोग मिल नहीं पाते  हैं...!!दूसरे आज के समाज के ठेकेदार इन्हें चैन से जीने नहीं देते ...!!! ऐसे  में बेचारे ये पोपुलर प्रेमी करें तो  क्या करें????...बेचारे कितने  दुखी है...इस बेज़ार दुनिया से !!!!
              आज कल पकिस्तान में भी इन पोपुलर  प्रेमियों को तंग करने के लिए एक शो  चला दिया है...जिसमे पकिस्तान की एक  पोपुलर एंकर   अपनी पूरी टीम के साथ जुटी हुई है इन प्रेमियों को दुखी करने में !!!....जैसे-जैसे  14  फरवरी पास आ रही है वैसे-वैसे  इन प्रेमियों की दिल की धड़कने और तेज़ होने लगी हैं...क्यूंकि एक और ये ख़ुशी का दिन है तो वही दूसरी ओर एक डर भी अन्दर-ही- अन्दर सता  रहा होगा की...कही किसी पार्क में हनुमान दल ,आर.एस.एस  या  शिव सैनिक ना मिल जाएँ  ...!!!इस प्रेम में बाधा डालने के लिए...!!!! 
             दरअसल   हमारी  सामाजिकता  में लड़के -लड़की दोस्त नहीं हो सकते हैं ....पोपुलर अवधारणा यही    है की लड़के लड़की की दोस्ती का अर्थ ही है "प्रेमी-प्रेमिका" होना ..!! और प्रेमी-प्रेमिका की एक ही अवधारणा है की या तो वो विवाह में बढ़ेंगे  या बिछोह की निति पे काम करेंगे..!!! राधा - कृष्ण दोस्त हो सकते हैं....कृष्ण -गोपियाँ   दोस्त हो सके हैं ....लेकिन लड़का-लड़की दोस्त नहीं हो सकते ...!!एकाध  बार दोस्त हो भी जाएँ ...लेकिन   फ्रेंड तो बिलकुल नहीं हो सकते हैं....!!!!....होंगे तो गड़बड़ ज़रूर करेंगे....ये सोच तो सार्वजनिक सोच है ..!!!
      आज का युवा आधुनिकता को एक अलग नज़रिए से देखता है...वो ल्वाइस  की जींस को और पिज्जा को आधुनिकता का पर्याय मान कर चलता है ...किसी व्यक्ति की आधुनिक सोच इस से पता लगाई जाती है की क्या उसने WOODLAND  के शूज़  पहने हैं या  नहीं 3G फ़ोन हाथ में है या नहीं...!!!और क्या वो व्यक्ति अपने साथ गर्ल फ्रेंड या बॉय फ्रेंड रखता है या नहीं...!!!क्योंकि  आज के ज़माने में गर्ल फ्रेंड /बॉय फ्रेंड ना रखने वाला व्यक्ति आधुनिक   सोच नहीं रखता है ......!!!!ये तो हुई  बड़े शहरों की बात लेकिन आज इस  आधुनिकता का प्रभाव आज देश के छोटे शहरों में रह रहे युवक और युवतियों के सर  पर नाचता हुआ दिखाई दे रहा है...!!! भूमंडलीकरण  के जहाँ इतनी सारी खूबियाँ   हैं की जहाँने युवाओं को इतना एक्सपोज़र दिया है वही श्लीलता  की हदें भी इसी   ने तोड़ी हैं..!!! ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की होड़ वाली कॉर्पोरेट-संस्कृति भी यहीं से आयी है...!!!!पोपुलर-संस्कृति से तो पहले से ही आहत  थे ओउसमे ये कारपोरेट संस्कृति  भी आ कर जुड़ गयी है...!!! ९१ के बाद के काल को देखें इन इस दशक ने भारतीय बाज़ार को जिस प्रकार बदला है वो अतुल्निय है...!!!पश्चिमिकर्ण ने जिस प्रकार हमारी सोच समझ..जीवनशैली ...हमारे जीवन मूल्यों को जिस प्रकार बदला है ...!!शायद हम सोच भी नहीं सकते थे...आज का युवा प्राइवेसी चाहता है..सामान्य टूर पर ऐसी प्राइवेसी नहीं मिल पाती है...तो ये प्राइवेसी  उन्हें आज कल के रेस्टोंरेंट  उपलब्ध    करवा रहे है ...!!!जिसमे ३००-५०० रुपये प्रति घंटा वे इन प्रेमियों से वसूलते हैं...!!!अब इस प्रकार की प्राईवेसी   किस प्रकार की प्राईवेसी होती होगी ये हम भली भांति प्रकार से समझ सकते हैं...!!!इस प्रकार की आधुनिकता इन युवाओं को किस और ले जाती है ???हम ये भी भली भांति प्रकार से समझ सकते हैं.         
                 आज इस पोपुलर प्रेम ने पूरा का पूरा एक बाज़ार खड़ा कर डाला है....1991  से शुरू हुए इस बाज़ार ने विश्व के सभी युवाओं को लुभाने के लिए एक मार्केट तैयार कर ली है...!!!!एक नया उपभोक्ता वर्ग तैयार कर लिया है और ज़बरन एक संस्कृति थोपी जा रही है...!!!आज के युवा से अगर पुचा  जाये कि 26  जनवरी का महत्व क्या है तो वो शायद ये बता  भी ना पायें की 26 जनवरी क्यों मनाई  जाती  है ???लेकिन फरवरी माह का हर एक दिन याद रखते हैं.....!!!!घर वालो के जन्मदिन भले ही भूल जाएँ लेकिन गर्ल फ्रेंड/बॉय फ्रेंड  के HAPPY BIRTH DAY को साल भर याद रखते हैं ...!!! आज ये संस्कृति ना केवल युवाओं का पथ भ्रष्ट कर रही है बल्कि उनहे उनकी परम्पराओं  और रिश्तो की अहमियत से दूर भी ले जा रही है..!!!




                                                                                                                                                                                                        

Tuesday, 3 January 2012

ई-साक्षरता और न्यू मीडिया(वेब-पोर्टल्स)




          आज जब विश्व एक इसे मोड़ पर खड़ा है जहा से सम्पूर्ण विश्व एक ग्लोबल विलेज की संज्ञा के लिए जाना जाता है  ....ऐसे में इन्टरनेट ने एक बहुत ही बड़ा योगदान निभाया है....!! विश्व को एक ही मंच पर लेन के लिए!!!! .....आज ये  देखा जा रहा  है की ....इलेक्ट्रोनिक मीडिया आज एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुक   है ...संचार के क्षेत्र में  और आज समय आ चला है न्यू- मीडिया का ' ..!!! अब यह एक बड़ा बाज़ार है भले ही हम अब भी डिगिटल दिवेद  की बार करते हों . भले ही अब ये कहा जाता हो की बहुसंख्य आबादी इन्टरनेट के इस्तेमाल दे दूर है , इन सबके बावजूद भारत में इन्टरनेट इस्तेमाल करने वालो की सख्या में दस करोड़ से ऊपर हो जाना अपने आप में बदलाव है....इतनी सख्या तो कई  विकसित देशों की जनसख्या तक नहीं है....और इतनी हमारे देश में उन लोगो की संख्या है जो की अपने दिन के कर्यलापो के लिए इन्टरनेट का इस्तेमाल करती है..!यानि की दूसरे शब्दों में कहे तो ये आंकड़ा उनका है जो डिगिटल साक्षर हैं..!!!
   
        ये बात तो हम सभी  जानते हैं की जब साक्षरता  बढती है तो खबरों का विस्तार  होना  तो लाज़मी ही है ...क्योंकि साक्षरता के साथ -साथ खबरों को पढने वालों की संक्या में इजाफा भी अनायास ही देखने को मिल जाता है..!!!दुनिया भर  में डिजीटल साक्षरता के साथ भी यही हुआ है   भारत में भी इन्टरनेट का उपयोग  बढ़ने के साथ साथ ही समाचार-पोर्टलों की संख्या में भी इजाफा देखने को मिला है....!!!! और साथ-ही-साथ समाचार पत्रों के  ई -संस्करणों में भी बढ़ोतरी हुई है..!!!! सबसे पहले अंग्रेजी के समाचार पत्रों और पोर्टल देखने को मिले और उसके बाद ही भारत की अन्य भाषाओँ में भी ई-पेपर और  न्यूज़ पोर्टल्स की मनो बाढ़ सी आ गयी..!!!!


       जब इनकी शुरुआत हुई थी तब तो ऐसा लगता था की सोशल मीडिया आने के बाद तो लगभग समाप्त ही हो जाएँगे किन्तु ऐसा कुछ हुआ नहीं ...सोशल मीडिया के साथ-साथ ये भी काफी चर्चित और लोकप्रिय होने लगे..!!!!  ...समाचार पोर्टलों की सबसे खूबी ये है की इसे कम जमापूंजी में भी शुरू किया जा सकता है..!!!! अखबार, पत्रिका या चेनेल शुरू करने के लिए काफी जमापूंजी की आवश्यकता पड़ती है और ..और  साथ ही साथ प्रसारण और प्रकाशन के लिए काफी बड़ा नेटवर्क खड़ा करना पड़ता है..!!! जबकि एक पोर्टल शुरू करने में ज्यादा दिक्कत नहीं आती है ..इसे हम एक कमरे में और कम्प्यूटर  सिस्टम में भी शुरू कर सकते हैं..!!!! समस्या शुरू होती है तो इस से आगे की ' ख़बरें कहाँ से जुटाई जाएँ..!!!!...बहुत से पोर्टल ऐसा नहीं कर पाते  हैं और शोर्ट कट  जैसे रस्ते अख्तियार करते हैं..!!!!....और यही से शुरू होती है कट और पेस्ट  पत्रकारिता..........जो की आजकल बाज़ार में काफी फल-फूल रही रही है. ये कुछ इसी प्रकार का है की किसी ज़माने में जब  क्षेत्रीय समाचार पत्रों को अन्तराष्ट्रीय  या राष्ट्रीय  खबरों के लिए निर्भर रहना बढता था ...!!

                     आज न्यूज़ पोर्टल्स की संख्या तो बढ़ रही हैं लेकिन समाचार सामग्री नहीं बढ़ रही है..अख़बारों  के ऑनलाइन संसकरण इन पोर्टलों के मुकाबले इसीलिए ज्यादा चल पाते हैं क्योंकि उनके पास  मौलिक और तथ्य परक ख़बरों की कोई कमी नहीं होती है..!!!!     और साथ ही साथ दूसरी समस्या ये है की इन ऑनलाइन पोर्टलों  का कोई पक्का मॉडल तो है नही ...  जबकि प्रिंट और डिजीटल मीडिया का एक पक्का मॉडल बन चुका है ...क्योंकि काफी लम्बे समय से बाज़ार में उपलब्ध हैं....!! ....जहा तक प्रिंट की बात की जाए तो उसने जनसंचार के क्षेत्र में में काफी उठापटक वाला समय देखा है..और इस लम्बे समाये के बाद आज वो अपने उस चारम सीमा पर पहुँच चुकी है की आज उसे किसी मॉडल की कोई आवश्यकता नहीं हैं ..!!!

                डिजिटल मीडिया में सबसे ज्यादा और महत्वपूर्ण कुछ है तो वो है विज्ञापन  ...!!इन्ही विज्ञापनों के कारण वेब पोर्टल चलते हैं...किन्तु भारत में ऑनलाइन  विज्ञापन अभी शुरूआती दौर में हैं....!! किन्तु चिंतित होने की कोई आवश्यकता नहीं है . क्योंकि जिस प्रकार से ऑनलाइन मीडिया ने कम समय में अपनी जितनी पकड़ बनायीं है उस लिहाज से तो ये भी काफी जल्दी लोकप्रिय हो जाएँगे ..!!और वो सामय दूर नहीं है जब डिजिटल मीडिया की धूम पूरे  भारत में मच जाएगी..!!!

Monday, 5 September 2011

POPULAR CULTURE OR PARIDHAN


 पो[पुलर कलचर  का प्रभाव प्रत्येक जन पर दिखाई दे जाता है!....पोपुलर काल्चर  का सर्वाधिक प्रभाव यदि किसी पर दिखाई देता है तो वो है 'वेशभूषा और परिधान' !............नीली जींस ओह!!!! माफ कीजिएगा जींस का तो मतलब ही 'नीला' होता है!.... बहरहाल जींस और जींस के साथ के साथ के नाना प्रकार के परिधान !......शहरों में तो काफी समय से है लेकिन ग्रामीण अंचलों में तो हाल ही में आए है!...कुछ अजीबो गरीब किस्म की जींस चलने लगी है ....उधाहरण के लिए फटी हुई जींस या फिर स्टोन-वाश जींस !....चलिए शहरों में तो ये सब आम बात है किन्तु गांवो में ये साधारण बात नहीं है....जब वहा के युवा इस प्रकार के परिधान पहनते है तो गाँव की 'चोपाल' पर बेठे बड़े-बूढ़े अक्सर ये  कहते नज़र आ जाते है की " ये आज कल के बालको को हो क्या गया है????कपडे ख़तम हो गए है क्या जो पुराने कपडे पहन कर घूम रहे है!...ये भी कोई फैशन है क्या?????...........यानि की एक वर्ग इस तरह के परिधानों  को सिरे से नकार रहा है!............. और आज.से ही नहीं पुराने ज़माने .........से चलिए एसा उदहारण लेकर आदि काल में चलते है...जब इंसान को आदि मानव या होमो के नाम से जाना जाता था!.......यदि उस समय में पोपुलर कल्चर के परिधानों की कल्पना की जाये तो कैसा लगे?.....हाँ तो हम बात कर रहे है आदि काल की जब मानव  'परिधान'  नामक वस्तु से  अनभिज्ञ था यानि की कपड़ों के नाम पर उसके शरीर  पर कुछ भी नहीं होता था.....ऐसे में उस समय यदि   किसी जंगल गाँव में कुछ नवयुवक पश्चिम से प्रभावित होकर कुछ परिधान नामक शौक को अपना कर जंगल में घूम रहे होते तो कैसा होता???उस समय तो कपड़ो के नाम पर हम केवल कुछ पत्तियां या फिर किसी जानवर की खाल को ही रख सकते है!.....यानि की कुछ युवक और युवतियां पत्तियां लपेटना शुरू कर दिया होगा.....पत्तियां देखा कर तो कुछ जानवर भी उनके पीछे पड़े हुए दिखाई दे जाते होंगे.....और वे अक्सर इधर-उधर भागते हुए नज़र अ जाते होंगे!!.....कुछ गुफाओं में बेठी गृहणिया उन पर हंसती होंगी और चोपाल पर बेठे हुए बड़े-बूढ़े आदि मानव ये कहते नज़र आते होंगे की "बताओ क्या ज़माना आ गया है....एक हमारा ज़माना था जब सादगी और सीधापन आँखों में नज़र आता था....और एक ये ज़माना है....जहा इन्हें शर्म ही नहीं है....बड़ों का लिहाज नहीं है.....पता नहीं कहा की सनक सवार हो गयी ही इन्हें???......राम जाने ये  पत्ते और खाल क्यों लपेटकर घूमते है.....इस से क्या सुन्दरता बढ़ जाती है?????.....सुसरे जानवर और पीछे पढ़ जाते है!